Brahmanda-Puran-Hindi-Book-PDF

ब्रह्माण्ड पुराण ग्रन्थ के बारे में अधिक विवरण | More details about Brahmanda Puran Book



इस ग्रन्थ का नाम है : ब्रह्माण्ड पुराण | इस ग्रन्थ के मूल रचइता है : महर्षि वेदव्यास | इस ग्रन्थ के संपादक है: डॉ चमन लाल गौतम | इस ग्रन्थ के प्रकाशक हैं : अज्ञात | इस ग्रन्थ की पीडीऍफ़ फाइल का कुल आकार लगभग 69 MB है | इस पुस्तक में कुल 893 पृष्ठ हैं | आगे इस पेज पर "ब्रह्माण्ड पुराण" ग्रन्थ का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इसे मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं.


Name of the book is : Brahmanda Puran | This Granth is originally written by : Maharshi Vedvyas | Editor of the book is : Dr. Chaman Lal Gautam | This book is published by : Unknown | PDF file of this book is of size 69 MB approximately. This book has a total of 893 pages. Download link of the book "Brahmanda Puran" has been given further on this page from where you can download it for free.


पुस्तक के संपादकपुस्तक की श्रेणीपुस्तक का साइजकुल पृष्ठ
डॉ चमन लाल गौतमधर्म, भक्ति, पुराण69 MB893



पुस्तक से : 

पुराणों में यही अन्तिम पुराण है। उच्च कोटि के पुराण में इसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसकी प्रशंसा में पुराणकार यहाँ तक चले गये कि उन्होंने इसे वेद के समान घोषित किया। इसका अभिप्राय यह हुआ कि पाठक जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वेद का अध्ययन करता है, उस तरह को विषय सामग्री उसे यहाँ भी प्राप्त हो जाती है और वह जीवन को चतुर्मुखी बना सकता है।

 

इस पुराण के नामकरण का रहस्य है कि इसमें समस्त ब्रह्मांड का वर्णन है। भुवनकोष का उल्लेख तो सभी पुराणों में मिलता है परन्तु प्रस्तुत पुराण में सारे विश्व का सांगोपांग वर्णन उपलब्ध होता है। इसमें विश्व के भूगोल का विस्तृत व रोचक विवेचन है। इसमें ऐसी-ऐसी जानकारी मिलती है जिसे देखकर आश्चर्य होता है कि बिना वैज्ञानिक सहयोग के इतनी गहन खोज कैसे की होगी। वैज्ञानिक युगमें अभी तक उसकी पुष्टि भी नहीं हो पायी है।

 

इस पुराण के पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और अध्ययन की परम्परा भी प्रशंसनीय है। गुरु ने अपने शिष्यों में से इसका ज्ञान अपने योग्यतम शिष्य को उसका पात्र समझ कर दिया ताकि इसकी परम्परा अवाध गति से निरन्तर चलती रहे। भगवान प्रजापति ने वसिष्ठ मुनि को, भगवान वसिष्ठ ऋषि ने परम पुण्यमय अमृत-सदृश इस तत्वज्ञान को शक्ति के पुत्र अपने पौत्र पाराशर को दिया। प्राचीनकाल में भगवान पाराशर ने इस परम दिव्यज्ञान को जातुकर्ण्य ऋषि को, जातुकर्ण्य ऋषि ने परम संयमी द्वैपायन को पढ़ाया। द्वैपायन ऋषि ने श्रुति के समान इस अद्भुत पुराण को अपने पाँच शिष्यों जैमिनि, सुमन्तु, वैशम्पायन, पेलव और लोमहर्षण को पढ़ाया। सूत परम विनम्र, धार्मिक और पवित्र थे। अतः उनको यह अद्भुत वृतान्त वाला पुराण पढ़ाया था। ऐसी मान्यता है कि सूतजी ने इस पुराण का श्रवण भगवान व्यासदेवजी से किया था। इन परमज्ञानी सूतजी ने ही नैमिषारण्य में महात्मा मुनियों को इस पुराण का प्रवचन किया था। वही ज्ञान आज हमारे सामने हैं।

 

 (नोट : उपरोक्त टेक्स्ट मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियां संभव हैं, अतः इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये.)


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