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श्री लिंग महापुराण ग्रन्थ के बारे में अधिक विवरण | More details about Shri Ling Mahapuran Book



इस ग्रन्थ का नाम है : श्री लिंग महापुराण | इस ग्रन्थ के मूल रचइता है : महर्षि वेदव्यास | इस ग्रन्थ के संपादक है: श्री राधेश्याम खेमका | इस ग्रन्थ के प्रकाशक हैं : गीता प्रेस, गोरखपुर | इस ग्रन्थ की पीडीऍफ़ फाइल का कुल आकार लगभग 640 MB है | इस पुस्तक में कुल 852 पृष्ठ हैं | आगे इस पेज पर "श्री लिंग महापुराण" ग्रन्थ का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इसे मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं.


Name of the book is : Shri Ling Mahapuran | This Granth is originally written by : Maharshi Vedvyas | Editor of the book is : Shri Radheshyam Khemka | This book is published by : Gita Press, Gorakhpur | PDF file of this book is of size 640 MB approximately. This book has a total of 852 pages. Download link of the book "Shri Ling Mahapuran" has been given further on this page from where you can download it for free.


पुस्तक के संपादकपुस्तक की श्रेणीपुस्तक का साइजकुल पृष्ठ
श्री राधेश्याम खेमकाधर्म, भक्ति, पुराण640 MB852



पुस्तक से : 

पुराण संख्या में 18 हैं जो श्रीमद्भागवत, श्रीदेवीभागवत, विष्णुपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि नामों से प्रसिद्ध हैं। इन्हीं अठारह महापुराणों में श्रीलिङ्गमहापुराण का भी परिगणन है। अन्य महापुराणों के समान ही सर्गादि पंचलक्षणों का निरूपण, भक्ति, ज्ञान, सदाचार की महिमा तथा जीव का श्रेयःसम्पादन और उसे भगवन्मार्ग में प्रतिष्ठित करा देना लिङ्गमहापुराणका तात्पर्य विषयीभूत अर्थ है । श्रीहरि के पुराणमय विग्रह में लिङ्गपुराण को भगवान्‌का गुल्फदेश माना गया है 'लैङ्गं तु गुल्फकम्।'(पद्मपुराण)

 

वेद प्रभुसम्मित वचन हैं, किंतु पुराण सुहृत्सम्मित हैं, पुराण आज्ञा नहीं देते, अपितु सच्चे मित्रकी भाँति कल्याणकारी बातों का सत्परामर्श प्रदान करते हैं। पुराणों का यह अपूर्व वैशिष्ट्य है कि इसमें वेदोंके गूढ़तम अर्थों को आख्यान - शैली में कथानक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। अतः रोचक होने से ये अधिक सुगम एवं सहज ग्राह्य हैं, यथा- वेदोंमें 'सत्यं वद'- सत्य बोलो का उपदेश है। पुराण में इसी उपदेश को महाराज हरिश्चन्द्र के आख्यान के माध्यम से समझाया गया है, इसी कारण पुराणों को विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

 

इस पुराणका यह नाम इसलिये दिया गया है कि इसमें परमात्मा परमशिवको लिङ्गी - निर्गुण - निराकार अर्थात् अलिङ्ग कहा गया है। यह परमात्मा अव्यक्त प्रकृतिका मूल है, लिङ्गका अर्थ है अव्यक्त अर्थात् प्रकृति- 'अलिङ्ग लिङ्गमूलं तु अव्यक्तं लिङ्गमुच्यते।' (लिङ्गपुराण पू० १ । ३ । १) 'लिङ्ग' शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है - सबको अपने में लीन रखनेवाला या विश्व के सभी प्राणिपदार्थों का उद्भावक, परिचायक चिह्न अथवा सम्पूर्ण विश्वमय परमात्मा - 'लयन्नाल्लिङ्गमुच्यते ।' (लिङ्गपुराण पू० १ । १९ । १६)

 

 (नोट : उपरोक्त टेक्स्ट मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियां संभव हैं, अतः इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये.)


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