Sadhana-Sudha-Sindhu --Ramsukh Dasji_pdf

साधन सुधा सिन्धु हिन्दी पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी | More details about Sadhan Sudha Sindhu Hindi Book



इस पुस्तक का नाम है : साधन सुधा सिन्धु | इस ग्रन्थ के लेखक/संपादक हैं : स्वामी रामसुखदास जी | इस पुस्तक के प्रकाशक हैं : गीता प्रेस गोरखपुर | इस पुस्तक की पीडीऍफ़ फाइल का कुल आकार लगभग 128 MB है | इस पुस्तक में कुल 1220 पृष्ठ हैं | आगे इस पेज पर "साधन सुधा सिन्धु" पुस्तक का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इसे मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं.


Name of the book is : Sadhan Sudha Sindhu | Author/Editor of this book is : Swami Ramsukhdas ji | This book is published by : Gita Press Gorakhpur | PDF file of this book is of size 128 MB approximately. This book has a total of 1220 pages. Download link of the book "Sadhan Sudha Sindhu" has been given further on this page from where you can download it for free.


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स्वामी रामसुखदास जीधर्म 128 MB1220



पुस्तक से : 

प्रस्तुत ग्रन्थ में परमश्रद्धेय श्रीस्वामी जी महाराज के उन लेखों एवं प्रवचनों का अनूठा संग्रह है, जो अबतक अनेक पुस्तकों के रूपमें अथवा स्वतन्त्र रूप में प्रकाशित होते रहे हैं। भगवत्प्रेमी साधकों के लिये यह संग्रह बहुत उपयोगी है और शीघ्र एवं सुगमतापूर्वक परमात्मतत्त्व का अनुभव कराने में बहुत सहायक है।

 

वर्तमान समय में साधन और साध्यका तत्त्व सरलतापूर्वक बतानेवाले ग्रन्थोंका अभाव-सा दीखता है। इससे साधकों को सही मार्ग दर्शन के बिना बहुत कठिनाई होती है। ऐसी स्थिति में परमात्मप्राप्ति के अनेक सुगम उपायोंसे युक्त तथा बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा-शैलीमें लिखित प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिके साधक के लिये यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी है। प्रत्येक साधक को इस ग्रन्थ में अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिये पूरी सामग्री मिलेगी।

 

जिस ज्ञानके अन्तर्गत देश-काल-वस्तु की प्रतीति होती है, वह चित्स्वरूप ज्ञान ही है तथा उसके अन्तर्गत आनेवाले देश-काल-वस्तुमात्र क्षण भर भी स्थिर न रहकर केवल परिवर्तनशील प्रतीत होते हैं। परिवर्तनशीलतामे वस्तु न होकर केवल क्रिया है और वह क्रिया भी केवल प्रतीत होती है, वस्तुतः वहाँ क्रिया भी न टिककर केवल ज्ञानमात्र ही है। वह ज्ञान चिन्मात्र है, ज्यों-का-त्यों विद्यमान है।

 

 (नोट : उपरोक्त टेक्स्ट मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियां संभव हैं, अतः इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये.)


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