Upanishadon-Ke-14-Ratan-Gita-press-book-pdf

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उपनिषदों के चौदह रत्न हिन्दी पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी | More details about Upanishadon ke Chaudah Ratna Hindi Book



इस पुस्तक का नाम है : उपनिषदों के चौदह रत्न | इस ग्रन्थ के लेखक/संपादक हैं : श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार | इस पुस्तक के प्रकाशक हैं : गीता प्रेस गोरखपुर | इस पुस्तक की पीडीऍफ़ फाइल का कुल आकार लगभग 28 MB है | इस पुस्तक में कुल 92 पृष्ठ हैं | आगे इस पेज पर "उपनिषदों के चौदह रत्न" पुस्तक का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इसे मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं.


Name of the book is : Upanishadon ke Chaudah Ratna | Author/Editor of this book is : Shri Hanuman Prasad Poddar | This book is published by : Gita Press Gorakhpur | PDF file of this book is of size 28 MB approximately. This book has a total of 92 pages. Download link of the book "Upanishadon ke Chaudah Ratna" has been given further on this page from where you can download it for free.


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श्री हनुमानप्रसाद पोद्दारउपनिषद, धर्म28 MB92



पुस्तक से : 

उपनिषद् हमारी वह अमूल्य निधि है, जिसमें संरक्षित विविध ज्ञान-विज्ञानमयी अचिन्त्य रत्नराशि की निर्मल सच्चिदानन्दमयी ज्योति- का एक कण प्राप्त करने के लिये समस्त संसारके तत्त्वज्ञ श्रद्धापूर्वक सिर अखण्ड का और हाथ पसारे खड़े हैं। उपनिषदों में उस कल्याणमय ज्ञान- का अखण्ड और अनन्त प्रकाश है, जो घोर क्लेशमयी और अन्धकारमयी भवाटवी में भ्रमते हुए जीव को सहसा उससे निकालकर नित्य निर्बाध ज्योतिर्मयी और पूर्णानन्दमयी ब्रह्मसत्ता में पहुँचा देता है।

 

पिता के क्रोधभरे वचन सुनकर नचिकेता सोचने लगा कि शिष्य और पुत्रों की तीन श्रेणियाँ हुआ करती हैं--उत्तम, मध्यम और अधम । जो गुरु का अभिप्राय समझकर उसकी आज्ञा की कोई प्रतीक्षा किये बिना ही सेवा करने लगते हैं वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पाने पर कार्य करते हैं वे मध्यम हैं और जो गुरु का अभिप्राय समझ लेने और आज्ञा सुन लेने पर भी गुरु के इच्छानुसार कार्य नहीं करते, वे अधम कहलाते हैं।

 

'श्रेय और प्रेय दोनों में से मनुष्य चाहे जिसको ग्रहण कर सकता है बुद्धिमान् पुरुष श्रेय और प्रेय दोनों के गुण-दोषों को भलीभांति समझकर उनका भेद करता है और नीर-क्षीरविवेकी हंस की तरह प्रेय को त्यागकर श्रेय को ग्रहण करता है । परंतु मूर्ख लोग 'प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते’-योगक्षेम के लिये यानी प्राप्त स्त्री, पुत्र, धनादिकी रक्षा और अप्राप्त भोग्य पदार्थों की प्राप्ति के लिये प्रेय को ही ग्रहण करते हैं।

 

 (नोट : उपरोक्त टेक्स्ट मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियां संभव हैं, अतः इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये.)


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